जीवन यात्रा
श्री श्री 108 स्वामी रामानन्द सरस्वती जी महाराज — नकुड़ वाले बाबा जी
॥ औरों के कल्याण में रहता जिनका ध्यान,
उनका अपने आप ही हो जाता कल्याण ॥

समाज के पथ-प्रदर्शक
नकुड़ वाले बाबा जी का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। जो भी उनकी वाणी एक बार सुन लेता, वह उन्हीं का होकर रह जाता था।

बामनौली में जन्म
जिला बागपत के ग्राम बामनौली में, चैत्र शुक्ल अष्टमी सन् 1912 को जन्म। माता भारती देवी के हृदय में बसी राम-भक्ति बालक में भी उतरी।

जहान सिंह — दुखियों के सेवक
बचपन का नाम जहान सिंह था। इनका हृदय दुखियों पर सदा तरस खाता और सेवा में लगा रहता था।

विवाह व पुत्र-जन्म
सन् 1934 में भागीरथी देवी के साथ विवाह हुआ। सन् 1936 में पुत्र जगपाल सिंह का जन्म हुआ।

पुलिस विभाग में नौकरी
18 जनवरी 1936 को पुलिस में नौकरी मिली। 1940 में पत्नी का देहांत हुआ, फिर भी कर्तव्य-पथ अडिग रहा। ड्यूटी पर गांधी जी, नेहरू जी, राजेन्द्र प्रसाद व शास्त्री जी के साथ भी रहे।

पथ-प्रदर्शकों से भेंट
कानपुर में श्री गंभीरानन्द जी व श्री रामशंकर पाठक जी से भेंट हुई। माता के दिए राम-भक्ति के संस्कार जाग उठे।

रामायण-प्रवचन व 'बाबा' खिताब
सहारनपुर पुलिस लाइन में रामायण पर प्रवचन शुरू किए। अधिकारी तक प्रभावित हुए — और 'बाबा' का खिताब पुलिस विभाग से ही मिला।

राम-नाम में लीन, निःस्वार्थ सेवा
धूप हो या रात की वर्षा, बिना रुके निःस्वार्थ प्रवचन करते रहे और किसी से एक पाई न ली। जनवरी 1960 में पुलिस सेवा से निवृत्त हुए।

श्री रामानन्द सरस्वती नामकरण
5 सितम्बर 1981 को हरिद्वार में श्री नारायण मुनि जी से संन्यास-दीक्षा ली। उनकी राम-भक्ति देख गुरु ने नाम रखा — 'श्री रामानन्द सरस्वती'।

प्रभु श्री राम में लीन
15 जनवरी 2003 की संध्या, सायं 5.55 बजे महाराज श्री राम के ध्यान में ही प्रभु में लीन हो गए। अगले दिन पन्तविहार के सत्संग भवन में भू-समाधि दी गई।

नाम व रूप-माधुरी अमिट
आज भी उनका नाम भक्तों के हृदय में अंकित है। धन्य हैं ऐसे सन्त — 'परोपकाराय सतां विभूतयः।'

सन्त देवी सुदीक्षा सरस्वती जी
उनकी सद् शिष्या व उत्तराधिकारिणी श्री श्री 108 सन्त देवी सुदीक्षा सरस्वती जी, गुरुदेव के चरण-चिह्नों पर चलते हुए सेवा, त्याग व भक्ति से जन-कल्याण कर रही हैं।
॥ परोपकाराय सतां विभूतयः ॥
— संतों की विभूतियाँ परोपकार के लिए ही होती हैं